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कलयुग का कमीना बाप Part- 4 ( Hindi Sex Story )

इस सेक्स कहानी में अभी तक आपने पढ़ा कि रात को मुझे सड़क किनारे एक लड़की मिली, वो खुद से मेरी गाड़ी में बैठ गयी और मुझे धमका कर उसने मेरे साथ सेक्स किया.
मुझे लगा कि वो लड़की मानसिक रूप से अस्वस्थ है तो मैंने अपनी पहचान के एक डॉक्टर को अपने घर बुलाया.
अब आगे:
मैंने अभी दो चार कश ही लिये थे कि फिर से दरवाज़े की बेल बजी।
मैं लपक कर दरवाज़े तक गया, दरवाज़ा खोलते ही डॉक्टर ऋतेश खड़े दिखाई दिए।
“गुड मॉर्निंग रोहित जी!” डॉक्टर ने मुस्कुराते हुए कहा।
“गुड मॉर्निंग डॉक्टर ऋतेश… आप अंदर आइये!” मैंने उन्हें अंदर आने को कहा। उनके अंदर आते ही मैंने दरवाज़ा बंद कर दिया और डॉक्टर के पास पहुँच गया।
“कहिए रोहित जी… इतनी सुबह सुबह किस समस्या ने आपके घर दस्तक दे दी जो आपने मुझे बुला लिया?” डॉक्टर हमेशा की तरह मुस्कुराते हुए बोले।
मैंने डॉक्टर को सोफ़े पर बैठने को कहा और फिर झिझकते हुए अपने ऑफिस से निकलने से लेकर सुबह उस लड़की के द्वारा अपने ऊपर हुए हमले तक की एक एक बात बता दिया। मेरी बात सुनकर डॉक्टर की आँखें फैल गई, वो अभी तक इस राज़ से अनजान थे कि मैं रात को लड़की बुलाता हूँ।
मैं सर झुकाये उनके बोलने का इंतज़ार करने लगे।
“मैं उस लड़की को देखना चाहता हूँ!” अचानक मेरे कानों में डॉक्टर की आवाज़ सुनाई दी।
मैंने नज़र उठाकर डॉक्टर को देखा और उठकर खिड़की के पास चला गया। डॉक्टर भी मेरे आगे आगे खिड़की के पास आ कर खड़े हो गए। अन्दर अभी भी वो लड़की नंगी फर्श पर पेट के बल लेटी हुई थी। लेकिन उसकी कराहें अब बंद हो चुकी थी। यह कहना मुश्किल होगा कि वो इस वक़्त जागती हुई हालत में थी या सोती हुई।
आप दरवाज़ा खोलिये…” डॉक्टर ने मेरी और देखते हुए कहा।
मैंने डॉक्टर को ऐसे देखा जैसे वो पागल हो गया हो- डॉक्टर, मैं आपको बता चुका हूँ कि यह लड़की पागल है… आपका अंदर जाना ठीक नहीं रहेगा.
मैंने डॉक्टर को समझाना चाहा।
“आप निश्चिन्त रहिये…” उन्होंने मेरी ओर देखते हुए कहा- मुझे कुछ नहीं होगा, मेरे लिए यह कोई नयी बात नहीं है, आप दरवाज़ा खोलिये.
“जैसी आपकी मर्ज़ी!” मैंने डॉक्टर से कहा और दरवाज़ा खोल दिया।
डॉक्टर धीरे धीरे अपने पाँव को अंदर बढ़ाता गया, वो चलते हुए बिल्कुल उस अजनबी लड़की के पास पहुँच गये। डॉक्टर ने पहले उस लड़की को चादर से ढक दिया फिर उसके सिरहाने बैठकर उसे ध्यान से देखने लगे। फिर अपना हाथ नीचे ले जाकर कुछ चेक करने लगे जो मैंने देख नहीं पाया।
कुछ देर तक उस लड़की का ज़ायज़ा लेने के बाद डॉक्टर बाहर आ गए।
“क्य हुआ डॉक्टर…?” मैंने बेचैन होते हुए पूछा।
किन्तु डॉक्टर ने मेरी बात का ज़वाब नहीं दिया, वो हॉल में टहलते रहे।
मुझसे डॉक्टर की ख़ामोशी सहन नहीं हो रही थी, मैं उनके जवाब के इंतज़ार में उनके आगे आगे चक्कर काटने लगा।
डॉक्टर एक नज़र मेरे चेहरे पर फेंक कर बोलने के लिए मुंह खोले- यह हिस्टीरिया का केस है।
“हिस्टीरिया?” मैंने हैरानी से देखते हुए दोहराया।
“जैसा आपने कहा कि यह लड़की सेक्स के दौरान अपने पापा को इमेजिन कर रही थी, तो इसका अर्थ है इस लड़की के साथ बचपन से बेचारी बाप के द्वारा शारीरिक शोषण हुआ है, और वो इस हद तक हुआ है कि यह लड़की उस चीज की आदि हो चुकी है। और अब किसी वजह से इसे अपने पापा से वो चीज नहीं मिल रहा है, यही कारण है कि यह आप जैसे अधेड़ आदमी के साथ यहाँ तक आयी और आपके साथ सेक्स भी किया।” डॉक्टर ने मुझे समझाया।
“वो सब तो ठीक है डॉक्टर लेकिन इसने मुझ पर हमला क्यों किया? यह कभी कभी बहुत ज़्यादा उग्र हो जाती है।” मैंने डॉक्टर को बताया।
“सीधी सी बात है… यह लड़की अपने बाप से नफरत करती है। जब तक यह सेक्स की कमी महसूस करती है, अपने बाप को पसंद करती है, लेकिन सेक्स पूरा होते ही इसे अपने बाप से नफरत होने लगती है। ऐसी हालत में यह अपने पिता की हत्या भी कर सकती है.” डॉक्टर ने मुझे बताया।
“अब आपके विचार से क्या करना चहिये?” मैंने डॉक्टर से राय माँगी।
मैं इसका इलाज़ करना चाहूँगा!” डॉक्टर ने कहा।
और मैंने डॉक्टर को किसी मसीहा की तरह देखा- थैंक यू डॉक्टर ऋतेश!
मैंने राहत की साँस लेते हुए कहा।
डॉक्टर उठे और वापस रूम के तरफ बढ़ गये। मैं एक बार डर महसूस करने लगा। डॉक्टर उस लड़की के पास जाकर घुटनों के बल बैठ गये और उस लड़की को उठाने लगे.
वो लड़की थोड़ी कसमसाती हुई उठकर बैठ गयी, उसने डॉक्टर को आँखें फाड़ कर देखा। इस बार उसकी आँखों में दरिन्दगी नहीं थी उसकी आँखों में पीड़ा थी।
“मैं डॉक्टर ऋतेश हूँ, मैं एक मनोचिकित्सक हूँ। इन्होंने मुझे फ़ोन करके बुलाया है, मैं तुम्हारा इलाज़ करना चाहता हूं, क्या तुम अपना प्रॉब्लम मुझे बता सकती हो?” डॉक्टर ने उसके सर पर हाथ फेरते हुए कहा।
जब डॉक्टर ने ‘इन्होंने’ कह कर मेरी और इशारा किया तो एक पल के लिए मैं काँप गया।
लेकिन उस लड़की ने एक नज़र मेरे ऊपर डाली और डॉक्टर की बातों में खो गयी। डॉक्टर की बात पूरा होते ही वो लड़की उसे ध्यान से देखने लगी, अचानक न जाने क्या हुआ वो लड़की फ़फ़क कर रो पड़ी।
मेरी आंखें हैरत से फ़ैल गयी लेकिन डॉक्टर प्यार से उसके सर पर हाथ फेरता रहा।
“तुम एक अच्छी ज़िन्दगी जी सकती हो! मैं तुम्हें पूरी तरह से ठीक कर दूँगा बस तुम्हें मुझ पर विश्वास करना होगा!” डॉक्टर ने जैसे उसके मन को पढ़ लिया था।
वो लड़की उनकी बातों के प्रभाव में आ रही थी- क्या आप सच में मुझे ठीक कर देंगे? क्या मैं एक नार्मल लड़की की तरह ज़िन्दगी जी सकती हूँ?” उसने रोते हुए डॉक्टर से कहा।
“बिल्कुल जी सकती हो… तुम ठीक होकर शादी कर सकती हो, घर बसा सकती हो और हर वो लाइफ जी सकती हो जिसकी तुम ख्वाहिश रखती हो!” डॉक्टर ने उसके आंसू पौंछते हुए कहा।
“मैं अपनी ज़िन्दगी से मायूस हो चुकी थी, मैं तो मर जाना चाहती थी, लेकिन अब जीना चाहती हूं, प्लीज डॉक्टर मुझे बचा लीजिये, मुझे ठीक कर दीजिये!” उसने डॉक्टर के आगे हाथ जोड़ते हुए कहा।
“तुम अपने कपड़े पहन लो, हम बाहर तुम्हारा इंतज़ार कर रहे हैं.” डॉक्टर ने उस लड़की से कहा और रूम से बाहर आ गया।
मैं हैरानी से डॉक्टर को देख रहा था जो कितनी आसानी से उस लड़की को अपने वश में कर लिया था। मैं डॉक्टर के साथ सोफ़े पर बैठ गया और उस लड़की के आने का इंतज़ार करने लगा।
कुछ देर बाद उस लड़की की आवाज़ हमें सुनाई दी- मेरे कपड़े यहाँ नहीं हैं!
वो दरवाज़े के पास चादर लपेटे खड़ी थी।
मुझे याद आया उसने कपड़े हॉल में उतारे थे जिसे मैंने उठाकर वाशिंग मशीन के ऊपर रख दिया था। मैं उठा और उसके कपड़े लेकर उसे दे दिये । कपड़े उसे पकड़ाते हुए मेरे अंदर थोड़ा सा डर भी था लेकिन डॉक्टर की मौजूदगी की वजह से मैं यह साहस कर गया।
“सॉरी… मैंने सुबह आपके साथ बहुत बुरा बर्ताव किया!” उसने मेरी ओर देख कर कहा।
मैं हैरान था कि इस लड़की को सब कुछ याद है, मुझे लगा था कि यह सब भूल गयी होगी।
“इटस ओके!” मैंने उसे जवाब दिया और वापस डॉक्टर के बगल में बैठ गया।
कुछ देर में वो लड़की हॉल में आ गई, डॉक्टर ने उसे बैठने को कहा, वो चुपचाप सोफ़े पर डॉक्टर के बगल में बैठ गयी।
“अगर तुम कम्फर्टेबल नहीं हो तो हम अकेले में भी बात कर सकते हैं.” डॉक्टर का इशारा मुझसे था लेकिन मुझे डॉक्टर की यह बात अच्छी नहीं लगी।
“मैं इन पर भरोसा कर सकती हूं, आप जो पूछना चाहते हैं पूछ सकते हैं.” उस लड़की ने कहा और मैं खुश हो गया।
“ठीक है, सबसे पहले तुम अपने बारे में बताओ कि तुम कौन हो, तुम्हारा नाम क्या है, तुम्हारे माता पिता कौन हैं?” डॉक्टर ने उसके सर पर हाथ फेरते हुए कहा।
उसने बताना शुरू किया:
मेरा नाम पिंकी चौधरी है, मेरे पापा का नाम सुरेन्द्र चौधरी और मम्मी का नाम पुष्पा चौधरी है। हमारी फैमिली काफी रॉयल फैमिली है। हमारे घर में किसी चीज की कमी नहीं है सिवाये प्यार के! लेकिन जब मैं छोटी थी, तब हमारे घर में भी प्यार बसता था।
पर जैसे जैसे मैं बड़ी होती गयी, मेरे घर से प्यार और शांति भी ग़ायब होने लगी।
मैंने पहली बार मम्मी पापा को आपस में लड़ते हुए देखा, मैं अपने रूम में पढ़ाई कर रही थी जब मम्मी की आवाज़ सुनाई दी, मैं अपने रूम से निकल कर मम्मी पापा के रूम तक गयी और खिड़की के पास खड़ी होकर देखने लगी।
मम्मी खूब गुस्से में लग रही थी जबकि पापा डरे सहमे एक ओर खड़े दिखाई दिए। वो किस बात पर लड रहे थे, यह तो मैं नहीं जान पायी लेकिन इतना जान गयी थी कि मम्मी किसी बात पर पापा से ग़ुस्सा हैं!
मुझे पहली बार अपने घर का माहौल बहुत ख़राब लगा। मैं वापस अपने रूम में आ गयी। और मम्मी पापा के बारे में सोचने लगी.
उसके बाद तो रोज़ ही घर में मम्मी पापा के झगड़े होने लगे, मम्मी पापा की रोज़ रोज़ की लड़ाई से मैं बहुत अकेली हो गयी, पहले रोज़ मैं मम्मी पापा के साथ बैठकर बात करती थी, अपनी फरमाईश रखती थी, लेकिन अब मैं उनसे दूर दूर रहने लगी, किसी चीज की फरमाईश करना तो बहुत दूर अब तो मैं मम्मी पापा के पास जाते हुए भी डरती थी।
मम्मी भी रोज़ रोज़ की लड़ाई से बहुत अपसेट रहने लगी, अपसेट में रहने की वजह से मम्मी ने मेरा फिकर करना छोड़ दिया, पहले मम्मी रोज़ मुझे स्कूल के लिए तैयार करती, अपने हाथों से नहलाती, मेरा नाश्ता बना कर देती, लेकिन अब वो सब कुछ बंद हो चुका था, मैं खुद ही नहाती, खुद ही तैयार होती और स्कूल जाती।
इसी तरह से मेरे बचपन के 5 साल और बीत गये, अब मैं 18 साल की हो चुकी थी। इन 5 सालों में घर की हालत पहले से ज़्यादा बिगड़ चुकी थी, मम्मी पापा अब अलग अलग सोने लगे थे, अक्सर जब मैं रात को बाथरूम जाने के लिए उठती तो पापा को हॉल में सोफ़े पर सोये हुए देखती, मैं इतना जान गयी थी की मम्मी पापा को पसंद नहीं करती इसलिये पापा सोफ़े पर सोते हैं।
अब मैं 18 साल की हो चुकी थी लेकिन मैं दूसरी लड़कियों की तरह नहीं थी, मेरी उम्र की लड़कियाँ अक्सर औरत मर्द के रिश्ते को समझने लगती हैं, लंड, चूत और चुदाई के बारे में भी जान जाती हैं लेकिन मैं इन चीजों से अन्जान थी, मैं तो यह भी नहीं जानती थी की मेरी कमर के नीचे और जांघों के बीच के जिस हिस्से से मैं रोज़ मूतती हूँ उसे क्या कहते हैं.
मैं बिल्कुल कोरी थी… मेरा मानसिक स्तर किसी छोटे बच्चे जितना ही था, क्यूंकि मम्मी पापा ने मुझे 8 साल से जैसे अकेली छोड़ दिया था और मेरा कोई दोस्त सहेली भी नहीं थी, मैं स्कूल में भी हमेशा अकेली रहती, किसी से कोई दोस्ती नहीं, कोई मेलजोल नहीं, मैं किसी से दोस्ती करने में डर महसूस करती थी।
अब मैं अकेली रहने की आदि हो चुकी थी। यही कारण है कि मेरा मानसिक विकास नहीं हो पाया। बस एक चीज जो मैं अपने आप में परिवर्तन महसूस कर रही थी वो थी कि मेरी छाती, मेरे बूब्स टेनिस के बॉल के साइज की हो गयी थी, मैं अक्सर उन्हें छू कर देखती और सोचती कि ये मेरी छाती पर क्या उठ रहा है, कहीं मुझे कोई बीमारी तो नहीं हो गयी है? कई बार मेरे मन में आया कि मैं मम्मी पापा को बताऊँ लेकिन मैं उनसे नहीं कह पायी।
कहानी जारी रहेगी।

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